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एक न्यायाधीश की हथौड़ी और तराजू, पुस्तकें और कानूनी पाठ की पृष्ठभूमि के साथ, न्याय और कानून के प्रतीकों का चित्रण।

प्रिय पाठकों ,

24 मार्च 2015, भारत के न्यायिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि इस दिन भारत के सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसा judgement दिया जिसने न सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की व्याख्या की बल्कि उन लाखों लोगों इस अधिकार की रक्षा भी की जो उसे संविधान द्वारा दिया गया है और जो लोकतंत्र का मूल स्तम्भ भी है। इस judgement ने Information Technology Act , 2000 के Section 66 A को निरस्त कर दिया जो की एक ऐतिहासिक कदम था। इस पुरे घटनाक्रम को जानने के लिए हमे करीब ढाई साल पीछे जाना होगा।

बात 2012 की है जब महाराष्ट्र के बड़े नेता Bala Saheb Thakrey की मृत्यु के बाद शिवसैनिकों द्वारा पुरे महाराष्ट्र खासकर मुंबई को बंद कर दिया जाता है , जिससे आम लोगों को काफी तकलीफ होती है और इस बंद का कड़ा विरोध करते हुए दो लड़कियों द्वारा social media में पोस्ट कर इस बंद की कड़ी आलोचना की जाती है। बस फिर क्या था , पुलिस तुरंत उनपर एक्शन लेती है और Information Technology Act , 2000 के Section 66 A के तहत FIR कर उनको अरेस्ट भी कर लेती है। इस घटना पर आम लोग काफी कड़ी प्रतिक्रिया देते है और इस पुलिस के द्वारा इस कानून के दुरूपयोग का आरोप लगाया जाता है। असल में IT Act के इस धारा की संछेप में इस तरह से व्याख्या हो सकती है की इसमें किसी computer या दूसरे electronic device के माध्यम से कोई ऐसी जानकारी साझा करना , जिससे इसी को परेशानी या असुविधा होती हो इसे इस धारा के तहत दोषी माना जायेगा।

इस घटना के कुछ दिनों बाद हालाँकि उन 2 लड़कियों को जमानत तो मिल गयी लेकिन लोगों का आक्रोश बना रहा और इसी क्रम में एक कानून की छात्रा Sreya Singhal ने Supreme Court में एक Writ petition दायर कर दी और इस कारन केस का नाम Sreya Singhal VS Union पड़ा ।

अब इस मामले की सुनवाई अदालत में शुरू हुई और अदालत के सामने कई ऐसे मामले आए जब इस धारा के दुरूपयोग की बात सामने आयी । सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुनाया और न सिर्फ इस धारा को असंवैधानिक घोषित किया बल्कि इसे अमान्य भी घोषित किया । अदालत ने अपने आदेश में ये कहा की इस धारा के कारन संविधान के अनुच्छेद 19 (i) (a) का भी उल्लंघन करता है। इसके बाद देश के नागरिकों को इस चिंता से मुक्ति मिली की अब सरकार या पुलिस किसी भी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार नहीं कर सकेगी की उसने किसी social media किसी व्यक्ति या संस्थान या सरकार के खिलाफ कोई बयान दिया है। हालाँकि इस आदेश के बाद भी कुछ ऐसे मामले अदालत के सामने आए जब पुलिस ने इस निरस्त हो चुके धारा के तहत भी केस किया लेकिन 2022 में Supreme Court के सख्त टिपण्णी के बाद इस तरह की कोई और घटना सामने नहीं आयी है।

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